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चीखों का कुआँ: एक रोंगटे खड़े कर देने वाली हिंदी हॉरर कहानी
अगर आधी रात के सन्नाटे में, लोहे की भारी ज़ंजीरों से जकड़े एक प्राचीन शापित कुएं के अंदर से तुम्हारी मृत पत्नी की रोने की आवाज़ आए... तो क्या तुम उसे बचाने के लिए नर्क का दरवाज़ा खोलोगे?
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'चीखों का कुआँ' कबीर नाम के एक ऐसे युवक की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी है, जो अपनी पत्नी अंजलि की एक भयानक कार दुर्घटना में हुई मौत के गहरे सदमे और अपराधबोध (Guilt) में जी रहा है। खुद को संभालने के लिए, वह हिमाचल प्रदेश के घने जंगलों और धुंध से घिरे एक सुदूर पहाड़ी गाँव 'श्यामला' में स्थित अपनी पुश्तैनी हवेली लौटता है।
इस विशाल और जर्जर हवेली के ठीक बीचों-बीच एक रहस्यमयी, पुराना कुआँ है, जिसे लोहे की मोटी जंग लगी ज़ंजीरों और प्राचीन तांत्रिक सीलों से जकड़ा गया है। कबीर के रहस्यमयी माधव चाचा उसे सख्त चेतावनी देते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, उस कुएं के पास नहीं जाना है, क्योंकि उसके नीचे कुछ ऐसा कैद है जो इंसानी समझ से बाहर है।
लेकिन अकेलेपन, अवसाद और नींद की दवाओं के नशे में डूबे कबीर को एक तूफानी रात उस कुएं के स्याह अंधेरे से अपनी मृत पत्नी अंजलि की तड़पती हुई आवाज़ सुनाई देती है—"कबीर, मुझे बचाओ, यहाँ बहुत ठंड है..."। अपने प्यार और गिल्ट में अंधा होकर कबीर कुल्हाड़ी उठाता है और कुएं की सदियों पुरानी सील को तोड़ देता है।
लेकिन कबीर यह नहीं जानता कि उसने अपनी पत्नी को नहीं, बल्कि सदियों से कैद एक ऐसी प्राचीन, निराकार और मायावी पिशाचिनी को आज़ाद कर दिया है जो इंसानी दुखों, डर और अपराधबोध को अपना निवाला बनाती है। सील टूटते ही पूरी पहाड़ी पर काली, ठंडी धुंध का साम्राज्य फैल जाता है और गाँव के लोग रहस्यमयी ढंग से मरने लगते हैं।
जब कबीर को अपनी भयानक भूल का अहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। क्या कबीर उस पिशाचिनी को दोबारा कैद कर पाएगा, या अपनी इस भयानक भूल की कीमत उसे अपनी जान और आत्मा देकर चुकानी होगी? अपराधबोध, धोखे और रूह कँपा देने वाले खौफ से भरी इस कहानी का अंत आपके पैरों तले से ज़मीन खिसका देगा।
अध्याय
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